श्रीराम की दी हुई अंगूठी हनुमानजी ने नीचे फेंकी
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी । मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥१॥
Trijata san bolee kar joree Maatu bipati sangini tai more ।
Tajau deh karu begi upaai Dusah birahu ab nahi sahi jaai ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहु लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥२॥
Aani kaath rachu chita banaai Maatu anal puni dehi lagaai ।
Satya karahi mam preeti sayaanee Sunai ko Shravan sool sam baanee ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥३॥
Sunat bachan pad gahi samuzaaesi Prabhu prataap bal sujasu sunaaesi ।
Nisi na anal mil sunu sukumaaree As kah so nij bhavan sidhaaree ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥४॥
Kah Sita bidhi bha pratikula Milihi na paavak mitihi na soola ।
Dekhiat pragat gagan angaara Avani na aavat ekau taara ॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥५॥
Paavakmay sasi sravat na aagee Maanahu mohi jaani hatabhaagee ।
Sunahi binay mam bitap asoka Satya naam karu haru mam soka ॥
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥६॥
Nootan kisalay anal samaana Dehi agini jani karahi nidaana ।
Dekhi param birahaakul sita So chhan kapihi kalap sam beeta ॥
(दोहा)
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥
Kapi kari hriday bichaar deenhi mudrika daari tab ।
Janu asok angaar deenh harashi uthi kar gaheu ॥