Monday, 24 June, 2024

Ayodhya Kand Doha 166

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Ayodhya Kand  							Doha 166

Ayodhya Kand Doha 166

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कौशल्या ने भरत को ढाढस बँधाई
 
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू । सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥१॥
 
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥२॥
 
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥३॥
 
मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥
जिऐ मरै भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥४॥
 
(दोहा)  
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास ।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥

 

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