Friday, 14 June, 2024

Bal Kand Doha 322

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Bal Kand  							Doha 322

Bal Kand Doha 322

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लग्न का वर्णन
 
(चौपाई)
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए । सादर सतानंदु सुनि आए ॥
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई । चले मुदित मुनि आयसु पाई ॥१॥

रानी सुनि उपरोहित बानी । प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी ॥
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं । करि कुल रीति सुमंगल गाईं ॥२॥

नारि बेष जे सुर बर बामा । सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा ॥
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं । बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं ॥३॥

बार बार सनमानहिं रानी । उमा रमा सारद सम जानी ॥
सीय सँवारि समाजु बनाई । मुदित मंडपहिं चलीं लवाई ॥४॥

(छंद)
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं ।
नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं ॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं ।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गती बर बाजहीं ॥

(दोहा)
सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय ।
छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय ॥ ३२२ ॥

 

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