Tuesday, 18 June, 2024

Bal Kand Doha 352

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Bal Kand  							Doha 352

Bal Kand Doha 352

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महाराजा दशरथ द्वारा विश्वामित्र का पूजन
 
(चौपाई)
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही । लोक बेद बिधि सादर कीन्ही ॥
भूसुर भीर देखि सब रानी । सादर उठीं भाग्य बड़ जानी ॥१॥
 
पाय पखारि सकल अन्हवाए । पूजि भली बिधि भूप जेवाँए ॥
आदर दान प्रेम परिपोषे । देत असीस चले मन तोषे ॥२॥
 
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा । नाथ मोहि सम धन्य न दूजा ॥
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी । रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी ॥३॥
 
भीतर भवन दीन्ह बर बासु । मन जोगवत रह नृप रनिवासू ॥
पूजे गुर पद कमल बहोरी । कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी ॥४॥
 
(दोहा)
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु ॥ ३५२ ॥

 

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