Friday, 14 June, 2024

Bal Kand Doha 58

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Bal Kand  							Doha 58

Bal Kand Doha 58

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पार्वती को अपनी भूल का अहेसास होता है
 
(चौपाई)
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी । चिंता अमित जाइ नहि बरनी ॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा । प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥१॥
 
संकर रुख अवलोकि भवानी । प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई । तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥२॥
 
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू । कहीं कथा सुंदर सुख हेतू ॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा ॥३॥
 
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन । बैठे बट तर करि कमलासन ॥
संकर सहज सरुप सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥४॥
 
(दोहा)
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं ।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥ ५८ ॥

 

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