Thursday, 30 May, 2024

Bharat ready to stay in forest forever

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मै आजीवन वनवास के लिए राजी – भरत
 
भरत बचन सुनि देखि सनेहू । सभा सहित मुनि भए बिदेहू ॥
भरत महा महिमा जलरासी । मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ॥१॥
 
गा चह पार जतनु हियँ हेरा । पावति नाव न बोहितु बेरा ॥
औरु करिहि को भरत बड़ाई । सरसी सीपि कि सिंधु समाई ॥२॥
 
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए । सहित समाज राम पहिँ आए ॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ॥३॥
 
बोले मुनिबरु बचन बिचारी । देस काल अवसर अनुहारी ॥
सुनहु राम सरबग्य सुजाना । धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥४॥
 
(दोहा)   
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ॥ २५७ ॥

 

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