Thursday, 30 May, 2024

Kaikeyi present her demands

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कैकेयी दशरथ से दो वरदान मागती है  
 
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥१॥
 
तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू ।ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥२॥
 
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥
बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥३॥
 
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥
मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥४॥
 
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं । दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं ॥ ५ ॥
 
(दोहा)  
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास ॥ २९ ॥

 

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