Monday, 22 July, 2024

Kaushalya embrace Ram

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कौशल्या ने भरत को गले लगाया
 
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥१॥
 
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥२॥
 
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ॥
करत बिलाप बहुत यहि भाँती । बैठेहिं बीति गइ सब राती ॥३॥
 
बामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे । कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥४॥
 
(दोहा)    
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु ।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥

 

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