Thursday, 30 May, 2024

Kevat refuse rent for the boat-ride

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Kevat refuse rent for the boat-ride

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केवट ने उतराई लेने से मना किया
 
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता । सीयराम गुह लखन समेता ॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा । प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ॥१॥
 
पिय हिय की सिय जाननिहारी । मनि मुदरी मन मुदित उतारी ॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई । केवट चरन गहे अकुलाई ॥२॥
 
नाथ आजु मैं काह न पावा । मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी । आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥३॥
 
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें । दीनदयाल अनुग्रह तोरें ॥
फिरती बार मोहि जे देबा । सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ॥४॥
 
(दोहा)
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ॥ १०२ ॥

 

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