Tuesday, 16 July, 2024

Lanka Kand Doha 31

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Lanka Kand  							Doha 31

Lanka Kand Doha 31

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अंगद और रावण का संवाद
 
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई । मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई ॥
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा । अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥१॥
 
सदा रोगबस संतत क्रोधी । बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी ॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी । जीवन सव सम चौदह प्रानी ॥२॥
 
अस बिचारि खल बधउँ न तोही । अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा । अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥३॥
 
रे कपि अधम मरन अब चहसी । छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥
कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें । बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥४॥
 
(दोहा)
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास ।
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास ॥ ३१(क) ॥
 
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक ।
खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥ ३१(ख) ॥

 

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