Monday, 24 June, 2024

Manthara succeed in her effort

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Manthara succeed in her effort

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आखिरकार मंथरा अपनी कोशिश में कामियाब 
 
चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥
पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानव रउरे  ॥१॥
 
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥
सालु तुम्हार कौसिलहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥२॥
 
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥३॥
 
यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥
आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥४॥
 
(दोहा)  
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु ॥
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥ १८ ॥

 

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