Friday, 12 July, 2024

Sumantra cry

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रामविरह की वेदना से व्यथित सुमंत्र
 
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई । बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई ॥
चले अवध लेइ रथहि निषादा । होहि छनहिं छन मगन बिषादा ॥१॥
 
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना । धिग जीवन रघुबीर बिहीना ॥
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू । जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ॥२॥
 
भए अजस अघ भाजन प्राना । कवन हेतु नहिं करत पयाना ॥
अहह मंद मनु अवसर चूका । अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ॥३॥
 
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई । मनहँ कृपन धन रासि गवाँई ॥
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई । चलेउ समर जनु सुभट पराई ॥४॥
 
(दोहा)    
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति ।
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति ॥ १४४ ॥

 

 

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