Friday, 21 June, 2024

Bal Kand Doha 331

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Bal Kand  							Doha 331

Bal Kand Doha 331

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महाराजा दशरथ गौदान करते है
 
(चौपाई)
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे ॥
चारि लच्छ बर धेनु मगाई । कामसुरभि सम सील सुहाई ॥१॥

सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं । मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं ॥
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू । लहेउँ आजु जग जीवन लाहू ॥२॥

पाइ असीस महीसु अनंदा । लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा ॥
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन । दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन ॥३॥

चले पढ़त गावत गुन गाथा । जय जय जय दिनकर कुल नाथा ॥
एहि बिधि राम बिआह उछाहू । सकइ न बरनि सहस मुख जाहू ॥४॥

(दोहा)
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ ।
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ ॥ ३३१ ॥

 

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