Monday, 24 June, 2024

Kiskindha Kand Doha 14

101 Views
Share :
Kiskindha Kand  							Doha 14

Kiskindha Kand Doha 14

101 Views

वर्षाऋतु का वर्णन
 
घन घमंड नभ गरजत घोरा । प्रिया हीन डरपत मन मोरा ॥
दामिनि दमक रह न घन माहीं । खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ॥१॥
 
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ । जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ॥
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें  । खल के बचन संत सह जैसें ॥२॥
 
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई । जस थोरेहुँ धन खल इतराई ॥
भूमि परत भा ढाबर पानी । जनु जीवहि माया लपटानी ॥३॥
 
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा । जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा ॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई । होई अचल जिमि जिव हरि पाई ॥४॥
 
(दोहा)
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥ १४ ॥

 

Share :

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *