Thursday, 30 May, 2024

Lanka Kand Doha 87

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Lanka Kand  							Doha 87

Lanka Kand Doha 87

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युद्ध का वर्णन
 
एहीं बीच निसाचर अनी । कसमसात आई अति घनी ।
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा । प्रलयकाल के जनु घन घट्टा ॥१॥
 
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं । जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं ॥
गज रथ तुरग चिकार कठोरा । गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥२॥
 
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए । मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए ॥
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा । बान बुंद भै बृष्टि अपारा ॥३॥
 
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा । बज्रपात जनु बारहिं बारा ॥
रघुपति कोपि बान झरि लाई । घायल भै निसिचर समुदाई ॥४॥
 
लागत बान बीर चिक्करहीं । घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं ॥
स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी । सोनित सरि कादर भयकारी ॥५॥
 
(छंद)
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी ।
दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥
जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने ।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥
 
(दोहा)
बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन ।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥ ८७ ॥

 

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